प्राचीन युग में लोग कैसे आत्मनिर्भर रहते थे।
बार्टर सिस्टम या हुन्डी प्रथा यानि वस्तु विनियम प्रणाली। जब देश में मुद्रा विनिमय प्रणाली शुरु नहीं हुई थी, तब लोग सामानों की अदला बदली करते थे। प्राचीन काल से गाँव इतने आत्मनिर्भर थे कि उन्हें चावल-दाल, तेल-मसाले, बर्तन-बासन, कोड़ी-कुदाल जैसे जरूरत के सभी चीज़ें गाँव में मिल जाती थी। बाहरी व्यापारियों से अनाज और मसालों के बदले सोने-चाँदी की मुहरें मिलती थी। पर, ग्रामीण जीवन में उसका कोई उपयोग न था। इसलिए, लोग उन मुहरों को जमीन में गाड़ देते थे।
देश में मुद्रा विनिमय प्रणाली चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में शुरू हुई। राजा के मंत्री-सेनापति, सैनिक और नौकर-चाकरों को काम के बदले सोने, चाँदी के सिक्के दिये जाने लगे। वे सिक्के देकर अनाज और अन्य जरूरत की चीज़ें खरीदते थे। धीरे-धीरे गाँवों में मुद्रा का प्रचलन बढ़ता गया। 18वीं सदी में मुद्राओं का स्थान कागज़ी नोटों ने ले लिया। 1770 ई में पहली बार कलकता में बैंक ऑफ हिंदुस्तान ने कागजी नोट छापना शुरू किया। 1861 ई में भारत में पेपर करेंसी एक्ट लागू होने के बाद नोटों का परिचालन बढ़ गया। जैसे-जैसे गाँवों में मुद्रा पर निर्भरता बढ़ती गई, गाँवों की आत्मनिर्भरता खत्म होती गई।
ऐसा नहीं है कि हुन्डी प्रथा गाँव से पूरी तरह खत्म हो गया। जिन गाँव की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है, वहाँ आज भी ये व्यवस्था जिंदा है। हम किसान लोग गाँव के कुम्हार से मिट्टी के बासन-बर्तन, लोहार से कोड़ी-कुदाल, हँसुआ-बैसला आदि लेते हैं। नाई, धोबी आदि से शादी-बिहा, मुंडन, मोरखी आदि समय काम लेते हैं। फिर, अगहन महीने में उन्हें काम के बदले काठ के हिसाब से धान, देते हैं। साथ ही परब-त्योहारों में आलू, प्याज और सब्जी वगैरा भी देते हैं। इस तरह बिना पैसे के ही हमारी सारी जरूरतें पूरी होती हैं। यही सामुहिकता गाँव की आत्मा है।
आज जब देश कोरोना संकट से गुजर रहा है। आवागमन बंद होने से किसान अपनी सब्जियों को बेच नहीं पा रहे। रोजगार ठप्प होने और पैसे के अभाव में गाँव के लोग जरूरत की चीजें नहीं खरीद पा रहे। ऐसी विकट स्थिति में हुन्डी प्रथा गाँव की आर्थिक स्थिति सुधारने में कारगर साबित हो सकती है। इससे ग्रामीणों में सामूहिकता की भावना जागेगी और गाँवों में आत्मनिर्भरता भी आएगी।

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